कलियुग, kaliyug

 कलियुग में किस तरह के लोग होंगे और किस तरह व्यवहार करेगे, कलियुग की स्त्री कैसी होगी, किस को ज्यादा पुण्य मिलेगा। 


कलिधर्मनिरूपण 

आज हम जानेंगे कलियुग के बारे में, इस युग में किस तरह के लोग होंगे और कैसे व्यवहार करेगे। यह युग कब से शुरू होगा और अंत कब होगा।

कलियुग के बारे में विष्णु पुराण, स्कंद पुराण और भविष्य पुराण आदि पुराणो में भी उल्लेख किया हुआ। श्रीमैत्रेयजी श्रीपराशरजी से कलयुग को लेकर कुछ सवाल करते हैं, और श्रीपराशरजी उन सवालो का जवाब देते हैं। आईये जानते हैं, कलियुग का युग कैसा होगा। 

श्रीमैत्रेयजी बोले - 

हे महामुने ! आपने सृष्टिरचना , वंश - परम्परा और मन्वन्तरॉकी स्थितिका तथा वंशो के चरित्रोंका विस्तार से वर्णन किया ॥१ ॥ 

अब मैं आपसे कल्पान्त में होनेवाले महाप्रलय नामक संसारके उपसंहारका यथावत् वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥२ ॥ 

श्रीपराशरजी बोले - 

हे मैत्रेय ! कल्पान्तके समय प्राकृत प्रलय ( भयानक विनाश ,सृष्टि का अंत) में जिस प्रकार जीवोंका उपसंहार होता है वह सुनो ॥३ ॥ 

हे द्विजोत्तम ! मनुष्योंका एक मास पितृगणका , एक वर्ष देवगणका और दो सहस चतुर्युग ब्रह्माका एक दिन - रात होता है ॥ ४॥ 

कौन से चार युग हैं? 

सत्ययुग , त्रेता , द्वापर और कलि - ये चार युग हैं , इन सबका काल मिलाकर बारह हजार दिव्य वर्ष कहा जाता है ॥५ ॥ 

हे मैत्रेय । [ प्रत्येक मन्वन्तरके ] आदि कृतयुग और अन्तिम कलियुगको छोड़कर शेष सब चतुर्युग स्वरूपसे एक समान हैं ॥६ ॥ जिस प्रकार आध ( प्रथम ) सत्ययुगमें ब्रह्माजी जगत्की रचना करते हैं उसी प्रकार अन्तिम कलियुगमें वे उसका उपसंहार करते हैं ॥७ ॥ 

श्रीमैत्रेयजी बोले - 

हे भगवन् ! कलिके स्वरूपका विस्तार से वर्णन कीजिये , जिसमें चार चरणोंवाले भगवान् धर्मका प्रायः लोप हो जाता है ॥८ ॥ 

श्रीपराशरजी बोले - 

हे मैत्रेय ! आप जो कलियुग का स्वरूप सुनना चाहते हैं सो उस समय जो कुछ होता है वह संक्षेपसे सुनिये ॥ ९ ॥ 

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कलियुग में मनुष्य कैसे होंगे:-

कलियुगमें मनुष्यों की प्रवृत्ति वर्णाश्रम - धर्मानुकूल नहीं रहती और न वह ऋक् - साम - यजुरूप त्रयी - धर्मका सम्पादन करनेवाली ही होती है ।॥ १०॥ 

उस समय धर्मविवाह , गुरु - शिष्य सम्बन्धकी स्थिति , दाम्पत्यक्रम और अग्निमें देवयज्ञक्रियाका क्रम ( अनुष्ठान ) भी नहीं रहता ॥११ ॥


कलियुगमें जो बलवान् होगा वही सबका स्वामी होगा चाहे किसी भी कुलमें क्यों न उत्पन्न हुआ हो , वह सभी वर्गोंसे कन्या ग्रहण करनेमें समर्थ होगा ॥१२ ॥ 


उस समय द्विजातिगण जिस - किसी उपायसे [ अर्थात् निषिद्ध द्रव्य आदिसे ] भी ' दीक्षित ' हो जायेंगे और जैसी - तैसी क्रियाएँ ही प्रायश्चित्त मान ली जायेंगी ।॥ १३ ॥ 

हे द्विज ! कलियुगमें जिसके मुख से जो कुछ निकल जायगा वही शास्त्र समझा जायगा ; उस समय सभी ( भूत - प्रेत - मशान आदि ) देवता होंगे और सभी के सव आश्रम होंगे ॥१४ ॥ उपवास , तीर्थाटनादि कायक्लेश , धन - दान तथा तप आदि अपनी रुचि के अनुसार अनुष्ठान किये हुए ही धर्म समझे जायंगे ॥१५ ॥ 

कलियुग की स्त्री किस तरह की होगी? 

कलियुगमें अल्प धनसे ही लोगोंको धनाढ्यताका गर्व हो जायगा और केशोंसे ही स्त्रियोंको सुन्दरताका अभिमान होगा ।॥ १६ ॥

 उस समय सुवर्ण , मणि , रत्न और वस्त्रोंके क्षीण हो जानेसे स्त्रियाँ केश - कलापोंसे ही अपनेको विभूषित करेंगी ॥१७ ॥ 

जो पति धनहीन (जिसके पास धन नही हो) होगा उसे स्त्रियाँ छोड़ देंगी । कलियुगमें धनवान् पुरुष ही स्त्रियोंका पति होगा ॥१८ ॥ 

जो मनुष्य [ चाहे वह कितनाहू निन्ध हो ] अधिक धन देगा वही लोगोंका स्वामी होगा ; यह धन - दानका सम्बन्ध ही स्वामित्वका कारण होगा , कुलीनता नहीं ॥१ ९ ॥

 कलिमें सारा द्रव्य संग्रह घर बनाने में ही समाप्त हो जायगा [ दान - पुण्यादिमें नहीं ] , बुद्धि धन - संचयमें ही लगी रहेगी [ आत्मज्ञानमें नहीं ] , सारी सम्पत्ति अपने उपभोगमें हो नष्ट हो जायगी [ उससे अतिथि सत्कारादि न होगा ] ॥२० ॥ 

कलिकालमें स्त्रियाँ सुन्दर , पुरुषकी कामनासे स्वेच्छाचारिणी (mastermind) होंगी तथा पुरुष अन्यायोपार्जित धनके इच्छुक होंगे ॥२१ ॥ 

हे द्विज ! कलियुगमें अपने सुहृदोंके प्रार्थना करनेपर भी लोग एक - एक दमड़ीके लिये भी स्वार्थ हानि नहीं करेंगे ॥२२ ॥ 

कलि में ब्राह्मणोंके देने के कारण ही गौओंका सम्मान होगा ॥ २३ ॥ साथ शूद्र आदि समानताका दावा करेंगे और दूध उस समय सम्पूर्ण प्रजा क्षुधाकी व्यथासे व्याकुल हो प्रायः अनावृष्टिके भयसे सदा आकाशकी और दृष्टि लगाये रहेगी ॥ २४ ॥ 

मनुष्य [ अन्नका अभाव होनेसे ] तपस्वियोंके समान केवल कन्द , मूल और फल आदिके सहारे ही रहेंगे तथा अनावृष्टि के कारण दुःखी होकर आत्मघात करेंगे ॥ २५ ॥

कलियुग में किस तरह के लोग सुख भोंगे? 

कलियुगमें असमर्थ लोग सुख और आनन्द के नष्ट हो जानेसे प्रायः सर्वदा दुर्भिक्ष तथा क्लेश ही भोगेंगे ॥ २६ ॥ 

कलियुग के आनेपर लोग बिना नहाये ही भोजन करेंगे , अग्नि , देवता और अतिथिका पूजन न करेंगे और न पिण्डोदक क्रिया ही करेंगे ॥२७ ॥ 

उस समयकी स्त्रियाँ विषयलोलुप , छोटे शरीरवाली , अति भोजन करनेवाली , अधिक सन्तान पैदा करनेवाली और मन्दभाग्या होंगी ॥२८ ॥ 

वे दोनों हाथोंसे सिर खुजलाती हुई अपने गुरुजनों और पतियोंके आदेशका अनादरपूर्वक खण्डन करेंगी ॥ २ ९ ॥ 

कलियुगकी स्त्रियाँ अपना ही पेट पालने में तत्पर , क्षुद्र चित्तवाली , शारीरिक होंगी ॥ ३० ॥ । 

उस समयको कुलांगनाएँ निरन्तर दुश्चरित्र शौचसे हीन तथा कटु और मिथ्या भाषण करनेवाली पुरुषोंकी इच्छा रखनेवाली एवं दुराचारिणी होंगी तथा पुरुषोंके साथ असद्व्यवहार करेंगी ॥३१ ॥ 

ब्रह्मचारिंगण वैदिक व्रत आदिसे हीन रहकर ही वेदाध्ययन करेंगे तथा गृहस्थगण न तो हवन करेंगे और न सत्पात्रको उचित दान ही देंगे ॥ ३२॥ 

वानप्रस्थ [ वनके कन्द - मूलादिको छोड़कर ] ग्राम्य भोजनको स्वीकार करेंगे और संन्यासी अपने मित्रादिके स्नेह बन्धनमें हो बंधे रहेंगे ॥३३ 

कलियुग में  कौन होगा राजा और सेवक ? 

कलियुगके आनेपर राजा लोग प्रजा की रक्षा नहीं करेंगे , बल्कि कर लेनेके बहाने प्रजा का ही धन छीनेंगे ॥ ३४ ॥ 

उस समय जिस - जिसके पास बहुत - से हाथी , घोड़े और रथ होंगे वह - वह ही राजा होगा तथा जो - जो शक्तिहीन (जिसके पास शक्ति ना हो) होगा वह - वह ही सेवक होगा ॥ ३५ ॥ 

वैश्यगण कृषि - वाणिज्यादि अपने कर्मोको छोड़कर शिल्पकारी आदिसे जीवन निर्वाह करते हुए शूद्रवृत्तियोंमें ही लग जायेंगे ॥ ३६॥

 आश्रमादिके चिह्नसे रहित अधम शूद्रगण संन्यास लेकर भिक्षावृत्तिमें तत्पर रहेंगे और लोगोंसे सम्मानित होकर पाषण्ड - वृत्तिका आश्रय लेंगे ॥ ३७॥ 

प्रजाजन दुर्भिक्ष और करकी पीड़ासे अत्यन्त उपद्रवयुक्त और दुःखित होकर ऐसे देशोंमें चले जायेंगे जहाँ गेहूँ और जाँकी अधिकता होगी ॥३८ ॥ उस समय वेदमार्गका लोप , मनुष्यों में पापण्डकी प्रचुरता और अधर्मको वृद्धि हो जानेसे प्रजाको आयु अल्प हो जायगी ॥ ३ ९ ॥

 लोगोंके शास्त्रविरुद्ध घोर तपस्या करनेसे तथा राजाके दोषसे प्रजाओंकी बाल्यावस्थामें मृत्यु होने लगेगी ॥४० ॥

कलिमें पाँच - छ : अथवा सात वर्ष की स्त्री और आठ - नौ या दस वर्षके पुरुषोंक ही सन्तान हो जायगी ॥ ४५ ॥ 

बारह वर्षको अवस्थामें ही लोगोंके बाल पकने लगेंगे और कोई भी व्यक्ति बीस वर्षसे अधिक जीवित न रहेगा ॥ ४२ ॥ 

कलियुग में लोगों की बुद्धि कैसी होगी ? 

कलियुगमें लोग मन्द - बुद्धि , व्यर्थ चिन धारण करनेवाले और दुष्ट चित्तवाले होंगे , इसलिये वे अल्पकालमें ही नष्ट हो जायेंगे ।। ४३ ॥

 हे मैत्रेय ! जब - जब धर्मकी अधिक हानि दिखलायी दे तभी - तभी बुद्धिमान् मनुष्यको कलियुगकी वृद्धिका अनुमान करना चाहिये । ४४॥ 

हे मैत्रेय ! जब - जब पाषण्ड बढ़ा हुआ दीखे तभी - तभी महात्माओंको कलियुगकी वृद्धि समझनी चाहिये ॥ ४५ ॥

 जब - जब वैदिक मार्गका अनुसरण करनेवाले सत्पुरुषोंका अभाव हो तभी - तभी बुद्धिमान् मनुष्य कलिको वृद्धि हुई जाने ॥ ४६॥ 

हे मैत्रेय जब धर्मात्मा पुरुषोंके आरम्भ किये हुए कार्योंमें असफलता हो तब पण्डितजन कलियुगकी प्रधानता समझें ॥ ४७ ॥ 

जब - जब यज्ञोंके अधीश्वर भगवान् पुरुषोत्तमका लोग योद्वारा यजन न करें तब - तब कलिका प्रभाव ही समझना चाहिये ॥४८ ॥ 

जब वेद - वादमें प्रीतिका अभाव हो और पाषण्डमें प्रेम हो तब बुद्धिमान् प्राज्ञ पुरुष कलियुगको बढ़ा हुआ जानें ॥ ४ ९ ।। 

हे मैत्रेय ! कलियुगमें लोग पाषण्डके वशीभूत हो जानेसे सबके रचयिता और प्रभुजगत्पति भगवान् विष्णुका पूजन नहीं करेंगे।॥५०॥

हे विप्र ! उस समय लोग पापण्डके वशीभूत होकर कहेंगे - ' इन देव , द्विज , वेद और जलसे होनेवाले शौचादिमें क्या रखा है ? ॥५१॥

हे विप्र कलिके आनेपर वृष्टि अल्प जलवाली होगी , खेती थोड़ी उपजवाली होगी और फलादि अल्प सारयुक्त होंगे ॥५२ ॥ 

कलियुगमें प्रायः सनके बने हुए सबके वस्त्र होंगे , अधिकतर शमी के वृक्ष होंगे और चारों वर्ण बहुधा शूद्रवत् हो जायेंगे ॥५३ ॥ 

कलिके आनेपर धान्य अत्यन्त अणु (कण) होंगे , प्रायः बकरियोंका ही दूध मिलेगा और उशीर ( खस ) ही एकमात्र अनुलेपन होगा ॥५४ ॥

 हे मुनिश्रेष्ठ ! कलियुगमें सास और ससुर ही लोगोंके गुरुजन होंगे और हृदयहारिणी भार्या तथा साले ही सुहद् होंगे ॥ ५५ ॥ 

लोग अपने ससुरके अनुगामी होकर कहेंगे कि कौन किसका पिता है और कौन किसकी माता सब पुरुष अपने कर्मानुसार जन्मते - मरते रहते हैं ' ॥५६ ॥

उस समय अल्पबुद्धि पुरुष बारम्बार वाणी , मन और शरीरादिके दोषोंके वशीभूत होकर प्रतिदिन पुन : पुनः पापकर्म करेंगे ।। ५७॥

 शक्ति , शौच और लज्जाहीन पुरुषोंको जो - जो दुःख हो सकते हैं कलियुगमें वे सभी दुःख उपस्थित होंगे ॥५८ ॥ 

उस समय संसारके स्वाध्याय और वषट्कारसे हीन तथा स्वधा और स्वाहासे वर्जित हो जानेसे कहीं - कहीं कुछ - कुछ धर्म रहेगा ॥ ५ ९ ॥ 

किंतु कलियुगमें मनुष्य थोड़ा - सा प्रयत्न करनेसे ही जो अत्यन्त उत्तम पुण्यराशि प्राप्त करता है वही सत्ययुगमें महान् तपस्यासे प्राप्त किया जा सकता है ॥ ६० ॥ 

श्रीपराशरजी बोले - 

हे महाभाग ! इसी विषयमें महामति व्यासदेवने जो कुछ कहा है वह मैं यथावत्  (ठीक उसी तरह) वर्णन (the description) करता हूँ , सुनो ॥१ ॥

किस युग में कम समय में ज्यादा पुण्य मिलेगा? 

 एक बार मुनियों में [ परस्पर ] पुण्यके विषयमें यह वार्तालाप हुआ कि ' किस समय में थोड़ा - सा पुण्य भी महान् फल देता है और कौन उसका सुखपूर्वक अनुष्ठान कर सकते हैं ? ' ॥२ ॥ 

हे मैत्रेय ! वे समस्त मुनिश्रेष्ठ इस सन्देहका निर्णय करनेके लिये महामुनि व्यासजीके पास यह प्रश्न पूछने गये ॥३ ॥ 

हे द्विज ! वहाँ पहुँचनेपर उन मुनिजनोंने मेरे पुत्र महाभाग व्यासजीको गंगाजी में आधा स्नान किये देखा ॥४ ॥ 

वे महर्षिगण व्यासजीके स्नान कर चुकनेकी प्रतीक्षामें उस महानदीके तटपर वृक्षोंके तले बैठे रहे ॥५ ॥ 

उस समय गंगाजीमें डुबकी लगाये मेरे पुत्र व्यासने जलसे उठकर उन मुनिजनोंके सुनते हुए ' कलियुग ही श्रेष्ठ है , शूद्र ही श्रेष्ठ है ' यह वचन कहा । ऐसा कहकर उन्होंने फिर जलमें डुबकी लगायी और फिर उठकर कहा- " शूद्र ! तुम ही श्रेष्ठ (अति उतम) हो तुम ही धन्य हो " ॥६-७ ॥ 

यह कहकर वे महामुनि फिर जलमें मग्न हो गये और फिर खड़े होकर बोले- " स्त्रियाँ ही साधु हैं , वे ही धन्य (श्रेष्ठ कर्म करनेवाला एवं पुण्यवान, ) हैं , उनसे अधिक धन्य (श्रेष्ठ कर्म करनेवाला एवं पुण्यवान, ) और कौन है ? " ॥८ ॥


तदनन्तर जब मेरे महाभाग पुत्र व्यासजी स्नान करनेके अनन्तर नियमानुसार नित्यकर्मसे निवृत्त होकर आये तो वे मुनिजन उनके पास पहुँचे॥९ ॥ 

वहाँ आकर जब वे यथायोग्य अभिवादनादिके अनन्तर आसनोंपर बैठ गये तो सत्यवतीनन्दन व्यासजीने उनसे पूछा- " आपलोग कैसे आये हैं ? " ॥१० ॥ 

तब मुनियोंने उनसे कहा- 

" हमलोग आपसे एक सन्देह पूछनेके लिये आये थे , किंतु इस समय उसे तो जाने दीजिये , एक और बात हमें बतलाइये ॥११ ॥

 भगवन् ! आपने जो स्नान करते समय कई बार कहा था कि कलियुग ही श्रेष्ठ है , शूद्र ही श्रेष्ठ हैं , स्त्रियाँ ही साधु और धन्य (श्रेष्ठ कर्म करनेवाला एवं पुण्यवान, ) हैं ' , सो क्या बात है ? हम यह पूरा विषय सुनना चाहते हैं और सभी बाते जानना चाहते है ।  हे महामुने ! यदि गोपनीय न हो तो कहिये । इसके पीछे हम आपसे अपना आन्तरिक सन्देह पूछेगे ' ॥१२-१३ ॥

किस तरह कलियुग ही श्रेष्ठ है , शूद्र ही श्रेष्ठ हैं , स्त्रियाँ ही साधु और धन्य हैं? 

 श्रीपराशरजी बोले - 

मुनियोंके इस प्रकार पूछनेपर व्यासजीने मुस्कुराते हुए कहा- " हे मुनिश्रेष्ठो ! मैंने जो इन्हें बारम्बार (कई बार) साधु - साधु कहा था , उसका कारण सुनो " ॥१४ ॥ 

श्रीव्यासजी बोले -

 हे द्विजगण ! जो फल सत्ययुग (सबसे पहला युग) में दस वर्ष (१० साल) तपस्या , ब्रह्मचर्य  (अष्टविध मैथुन से बचना) और जप आदि करनेसे मिलता है उसे मनुष्य त्रेतामें एक वर्ष , द्वापरमें एक मास और कलियुगमें केवल एक दिन - रातमें प्राप्त कर लेता है , इस कारण ही मैंने कलियुग (सबसे आखिरी युग) को श्रेष्ठ कहा है ॥ १५-१६ ॥ 

जो फल सत्ययुग (सबसे पहला युग)  में ध्यान , त्रेतामें यज्ञ और द्वापरमें देवार्चन करनेसे प्राप्त होता है वही कलियुग (सबसे आखिरी युग) में श्रीकृष्णचन्द्रका नाम - कीर्तन करनेसे मिल जाता है ॥१७ ॥ 

हे धर्मज्ञगण ! कलियुगमें थोड़े - से परिश्रमसे ही पुरुषको महान् धर्मकी प्राप्ति हो जाती है , इसीलिये मैं कलियुगसे अति सन्तुष्ट हूँ ॥१८ ॥

 [ अब शूद्र क्यों श्रेष्ठ (अति उतम) हैं , यह बतलाते हैं ] 

द्विजातियोंको पहले ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए वेदाध्ययन करना पड़ता है और फिर स्वधर्माचरणसे उपार्जित धनके द्वारा विधिपूर्वक यज्ञ करने पड़ते हैं ॥१ ९ ॥ 

इसमें भी व्यर्थ वार्तालाप , व्यर्थ भोजन और व्यर्थ यज्ञ उनके पतनके कारण होते हैं ; इसलिये उन्हें सदा संयमी रहना आवश्यक है॥२०॥सभी कामोंमें अनुचित ( विधिके विपरीत ) करनेसे उन्हें दोष लगता है ; यहाँतक कि भोजन और पानादि भी वे अपने इच्छानुसार नहीं भोग सकते ॥२१ ॥ क्योंकि उन्हें सम्पूर्ण कार्यों में परतन्त्रता रहती है । हे द्विजगण ! इस प्रकार वे अत्यन्त क्लेशसे पुण्य - लोकोंको प्राप्त करते हैं ॥ २२ ॥

किंतु जिसे केवल [ मन्त्रहीन ] पाक - यज्ञका ही अधिकार है वह शूद्र द्विजोंकी सेवा करनेसे ही सद्गति प्राप्त कर लेता है , इसलिये वह अन्य जातियोंकी अपेक्षा धन्यतर है ॥२३ ॥

 हे मुनिशार्दूलो ! शूद्रको भक्ष्याभक्ष्य अथवा पेयापेयका कोई नियम नहीं है , इसलिये मैंने उसे साधु कहा है ।॥ २४ ॥

 [ अब स्त्रियों को क्यों श्रेष्ठ कहा , यह बतलाते हैं- ]

पुरुषोंको अपने धर्मानुकूल प्राप्त किये हुए धनसे ही सर्वदा सुपात्रको दान और विधिपूर्वक यज्ञ करना चाहिये ॥ २५ ॥ 

हे द्विजोत्तमगण ! इस द्रव्यके उपार्जन तथा रक्षणमें महान् क्लेश होता है और उसको अनुचित कार्यमें लगानेसे भी मनुष्योंको जो कष्ट भोगना पड़ता है वह मालूम ही है ।॥ २६ ॥ 

इस प्रकार हे द्विजसत्तमो ! पुरुषगण इन तथा ऐसे ही अन्य कष्टसाध्य उपायोंसे क्रमशः प्राजापत्य आदि शुभ लोकोंको प्राप्त करते हैं।॥२७ ॥
 किंतु स्त्रियाँ तो तन - मन - वचनसे पतिकी सेवा करनेसे ही उनकी हितकारिणी (वह जो हित चाहता हो) होकर पतिके समान शुभ लोकोंको अनायास ही प्राप्त कर लेती हैं जो कि पुरुषोंको अत्यन्त परिश्रमसे मिलते हैं । इसीलिये मैंने तीसरी बार यह कहा था कि ' स्त्रियाँ साधु हैं ॥ २८-२९ ॥ 

" हे विप्रगण ! मैंने आपलोगोंसे यह [ अपने साधुवादका रहस्य ] कह दिया , अब आप जिसलिये पधारे हैं वह इच्छानुसार पूछिये । मैं आपसे सब बातें स्पष्ट करके कह दूँगा " ॥३० ॥

 तब ऋषियोंने कहा - 

' हे महामुने ! हमें जो कुछ पूछना था उसका यथावत् उत्तर आपने इसी प्रश्नमें दे दिया है । [ इसलिये अब हमें और कुछ पूछना नहीं है ] ॥ ३१ ॥ श्रीपराशरजी बोले - तब मुनिवर कृष्णद्वैपायनने विस्मयसे खिले हुए नेत्रोंवाले उन समागत तपस्वियोंसे हँसकर कहा ॥३२ ॥

 मैं दिव्य दृष्टिसे आपके इस प्रश्नको जान गया था इसीलिये मैंने आपलोगोंके प्रसंगसे ही ' साधु - साधु ' कहा था ॥ ३३ ॥ जिन पुरुषोंने गुणरूप जलसे अपने समस्त दोष धो डाले हैं उनके थोड़े - से प्रयत्नसे ही कलियुगमें धर्म सिद्ध हो जाता है ।॥ ३४ ॥

 हे द्विजश्रेष्ठो ! शूद्रोंको द्विजसेवापरायण होनेसे और स्त्रियोंको पतिकी सेवामात्र करनेसे ही अनायास धर्मकी सिद्धि हो जाती है ॥३५ ॥ इसीलिये मेरे विचारसे ये तीनों धन्यतर हैं , क्योंकि सत्ययुगादि अन्य तीन युगोंमें भी द्विजातियोंको ही धर्म सम्पादन करने में महान् क्लेश उठाना पड़ता है ॥३६ ॥

 हे धर्मज्ञं ब्राह्मणो ! इस प्रकार आपलोगोंका जो अभिप्राय (इरादा) था वह मैंने आपके बिना पूछे ही कह दिया , अब और क्या करूँ ? " ॥ ३७ ॥

श्रीपराशरजी बोले -

 तदनन्तर उन्होंने व्यासजीका पूजनकर उनकी बारम्बार प्रशंसा की और उनके कथनानुसार निश्चयकर जहाँसे आये थे वहाँ चले गये ॥ ३८॥ 

कलियुग में किस भगवान का संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता हैं? 


हे महाभाग मैत्रेयजी ! आपसे भी मैंने यह रहस्य कह दिया । इस अत्यन्त दुष्ट कलियुगमें यही एक महान् गुण है कि इस युगमें केवल कृष्णचन्द्रका नाम - संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य परमपद प्राप्त कर लेता है ॥३ ९ ॥ 


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