जया एकादशी व्रत कथा, शुभ मुहूर्त क्या हैं?

जया एकादशी व्रत की कथा


आईये जानते हैं जया एकादशी व्रत कथा क्या हैं और शुभ मुहूर्त कब हैं? जया एकादशी व्रत की कथा पद्मा पुराण में भी दी गयी हैं। 

जया एकादशी व्रत का पूजा मुहूर्त:-

23 फरवरी (february) के दिन रवि योग सुबह 06 बजकर 52 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक है और त्रिपुष्कर योग शाम को 06 बजकर 05 मिनट से अगले दिन 24 फरवरी (24 february)को प्रात: 06 बजकर 51 मिनट तक है। ऐसे में जया एकादशी रवि योग में मनेगी। इस दिन राहुकाल दोपहर 03 बजकर 26 मिनट से शाम 04 बजकर 51 मिनट तक हैं। 

जया एकादशी पारण का समय:-


जो लोग जया एकादशी का व्रत रखेंगे, वे अगले दिन द्वादशी को पारण करेंगे। आपको 24 फरवरी (24 February) को सुबह 06 बजकर 51 मिनट से सुबह 09 बजकर 09 मिनट के मध्य जया एकादशी व्रत (jaya ekadashi vrat) का पारण कर लेना चाहिए। जो लोग एकादशी व्रत रखते हैं, उनको द्वादशी के समापन से पूर्व ही पारण कर लेना चाहिए। 24 फरवरी (24 february) को द्वादशी का समापन शाम को 06 बजकर 05 मिनट पर होगा।

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व्रत कथा:-

युधिष्ठिरने पूछा - भगवन् ! आपने माघ मासके कृष्ण पक्षकी षट्तिला एकादशीका वर्णन किया । अब कृपा करके यह बताइये कि शुक्ल पक्षमें कौन - सी एकादशी होती है ? उसकी विधि क्या है ? तथा उसमें किस देवता (vishnu bhagwan) का पूजन किया जाता है ? 

भगवान् श्रीकृष्ण बोले - राजेन्द्र ! बतलाता हूँ , सुनो । माघ मासके शुक्ल पक्षमें जो एकादशी होती है , उसका नाम ' जया ' है । वह सब पापोंको हरनेवाली उत्तम तिथि है । पवित्र होनेके साथ ही पापोंका नाश करनेवाली है तथा मनुष्योंको भोग और मोक्ष प्रदान करती है । इतना ही नहीं , वह ब्रह्महत्या - जैसे पाप तथा पिशाचत्वका भी विनाश करनेवाली है इसका व्रत करनेपर मनुष्योंको कभी प्रेतयो नहीं जाना पड़ता । इसलिये राजन् ! प्रयत्नपूर्वक ' जया ' नामको एकादशी का व्रत करना चाहिये । 

व्रत कथा:-

एक समय की बात है , स्वर्गलोक देवराज इन्द्र राज्य करते थे । देवगण पारिजात वृक्षोंसे भरे हुए नन्दनवनमें अप्सराओके साथ विहार कर रहे थे । पचास करोड़ गन्धर्वोक नायक देवराज इन्द्रने स्वेच्छानुसार वनमें विहार करते हुए बड़े हर्षक साथ नृत्यका आयोजन किया । उसमें गन्धर्व गान कर रहे थे , जिनमें पुष्पदत्त , चित्रसेन तथा उसका पुत्र - ये तीन प्रधान थे । चित्र सेनकी स्त्रीका नाम मालिनी था । मालिनीसे एक कन्या उत्पन्न हुई थी , जो पुष्पवन्तीके नामसे विख्यात थी । पुष्पदन्त गन्धर्वके एक पुत्र था , जिसको लोग माल्यवान् कहते थे । माल्यवान् पुष्पवन्तीके रूपपर अत्यन्त मोहित था ।

 ये दोनों भी इन्द्रके संतोषार्थ नत्य करनेके लिये आये थे । इन दोनोंका गान हो रहा था , इनके साथ अप्सराएँ भी थीं । परस्पर अनुरागके कारण ये दोनों मोहके वशीभूत हो गये । चित्तमें प्रान्ति आ गयी । इसलिये वे शुद्ध गान न गा सके । 

कभी ताल भंग हो जाता और कभी गीत बंद हो जाता था । इन्द्रने इस प्रमाद पर विचार किया और इसमें अपना अपमान समझकर वे कुपित हो गये । 
अतः इन दोनोंको शाप देते हुए बोले - ' ओ मूखों ! तुम दोनोंको धिक्कार है ! तुम लोग पतित और मेरी आज्ञा भंग करनेवाले हो ; अतः पति - पत्नी के रूपमें रहते हुए पिशाच हो जाओ । ' इन्द्रके इस प्रकार शाप देनेपर इन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख हुआ । वे हिमालय पर्वतपर चले गये और पिशाच- योनिको पाकर भयङ्कर दुःख भोगने लगे । शारीरिक पातकसे उत्पन्न तापसे पीड़ित होकर दोनों ही पर्वतकी कन्दराओंमें विचरते रहते थे । 


एक दिन पिशाचने अपनी पत्नी पिशाची से कहा - हमने कौन - सा पाप किया है , जिससे यह पिशाच - योनि प्राप्त हुई है ? नरकका कष्ट अत्यन्त भयङ्कर है तथा पिशाचयोनि भी बहुत दुःख देने- वाली है । अतः पूर्ण प्रयत्न करके पापसे बचना चाहिये । ' इस प्रकार चिन्तामग्न होकर वे दोनों दुःखके कारण सूखते जा रहे थे । दैवयोगसे उन्हें माघ मासकी एकादशी तिथि प्राप्त हो गयी । ' जया ' नामसे विख्यात तिथि , जो सब तिथियों में उत्तम है , आयो । 

उस दिन उन दोनों ने सव प्रकारके आहार त्याग दिये । जलपानतक नहीं किया । किसी जीवकी हिंसा नहीं की , यहाँतक कि फल भी नहीं खाया । निरन्तर दुःखसे युक्त होकर वे एक पीपलके समीप बैठे रहे । सूर्यास्त हो गया । उनके प्राण लेनेवाली भयङ्कर रात उपस्थित हुई । 
उन्हें नींद नहीं आयी । वे रति या और कोई सुख भी नहीं पा सके । सूर्योदय हुआ । द्वादशीका दिन आया । उन पिशाचोंके द्वारा ' जया के उत्तम प्रतका पालन हो गया । उन्होंने रातमें जागरण भी किया था । 


उस प्रतके प्रभावसे तथा भगवान् विष्णुकी शक्तिसे उन दोनोंकी पिशाचता दूर हो गयी । पुष्पवत्ती और माल्यवान् अपने पूर्वरूपमें आ गये । उनके हृदय में वही पुराना स्नेह उमड़ रहा था । उनके शरीरपर पहले ही - जैसे अलङ्कार शोभा पा रहे थे । वे दोनों मनोहर रूप धारण करके विमानपर बैठे और स्वर्गलोकमें चले गये । वहाँ देवराज इन्द्र के सामने जाकर दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया । उन्हें इस रूपमें उपस्थित देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ । उन्होंने पूछा ' बताओ , किस पुण्यके प्रभावसे तुम दोनोंका पिशाचत्व दूर हुआ है । तुम मेरे शापको प्राप्त हो चुके थे , फिर किस देवताने तुम्हें उससे छुटकारा दिलाया है ? " 


माल्यवान् बोला - स्वामिन् ! भगवान् वासुदेवकी कृपा तथा ' जया ' नामक एकादशीके व्रतसे हमारी पिशाचता दूर हुई है । इन्द्रने कहा - तो अब तुम दोनों मेरे कहनेसे सुधापान करो । जो लोग एकादशीके व्रतमें तत्पर और भगवान् श्रीकृष्णके शरणागत होते हैं , वे हमारे भी पूजनीय है । 

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं - राजन् ! इस कारण एकादशी (ekadashi) का व्रत करना चाहिये । नृपश्रेष्ठ ! ' जया ' ब्रह्महत्याका पाप भी दूर करनेवाली है । जिसने ' जया ' (jaya) का व्रत किया है , उसने सब प्रकारके दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया । इस माहात्म्यके पढ़ने और सुननेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है ।

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